Saturday, August 6, 2011

कितने लम्हे सावन बनकर आये यूँ ही चले गए
प्यार के लितने बदल घुमड़े बिन बरसे ही चले गए
टूट रहा है संयम मन का ये कैसा आकर्षण है
प्रेम कि बदरी बरस जाओ तपते मन का आमंत्रण है

1 comment:

  1. just read second line as
    'pyar ke kitne badal .....' instead of 'pyar ke litne badal....'

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