Saturday, August 6, 2011

नन्ही चिड़िया
जो ड्योड़ी पर अक्सर दिख जाती थी
कभी बेपरवाह स्वयं में खोयी
कभी सहम सी जाती थी
उसके नाज़ुक पंख ,बड़े स्वप्नों का बोझ नहीं उठा पते
कभी फुदक-फुदक कर चलती थी ,या
उड़ते-उड़ते गिर जाती थी
चीं-चीं चूं-चूं करके जाने क्या गाती थी
जाने क्यूँ मन लुभाने लगा था
उसका हर क्रियान्वयन
उसकी आदत सी हो गयी थी
पर दिन-प्रतिदिन कोमल पंख मजबूत हो रहे थे
और एक दिन ....

घर कि मुंडेर पर अंतिम बार देखा था उसे
अब उसका अल्हड़ बचपन
फुदकना सहमना
उड़ने कि कोशिश में गिरना
सब सिमटा है स्मृतियों में

नन्ही चिड़िया
आशीष तुम्हे
उन्मुक्त आकाश ,स्वच्छंद विचरण का
और विनती कि फिर आना
ड्योड़ी पर या घर कि मुंडेर पर ...

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