Wednesday, April 25, 2012

तुम्हे मालूम न होगा क्या कुछ कर गया था मैं 
तुम्हारी चाह में रस्मे-जहाँ से लड़ गया था मैं 
तुम्हारा ही हुआ होता जो तुम इजहार कर पातीं 
तुम खामोश थीं बिलकुल अकेला पड़ गया था मैं
तुम जैसी कोई प्रतिमा ह्रदय में गढ़ नहीं पाए
तुम्हारी याद से आगे कभी हम बढ़ नहीं पाए
मोहब्बत के नर्म एहसास थे दोनों के सीने में  
जुबां कुछ कह नहीं पायी नज़र हम पढ़ नहीं पाए

Thursday, January 5, 2012

महकती जुल्फों में कहाँ उलझ कर रह गए हो तुम
नज़रों की अंजुमन में कहाँ भटक कर रह गए हो तुम
इन नजरो और जुल्फों से बाहर भी एक दुनिया है
कहाँ होना था तुम्हे और कहाँ अटक कर रह गए हो तुम
कर दो तुम मेरा तिरस्कार
मै देव नहीं न कोई परमेश्वर ना शास्वत प्रेमी या अनुरागी हूँ
उफनी नदिया ,ढोंगी साधू सा अभिमानी वैरागी हूँ
मेरे विछोह की सुध भर से क्यों बहा रही हो अश्रुधार
कर दो......................