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BRIJENDRA VERMA
Wednesday, April 25, 2012
तुम्हे मालूम न होगा क्या कुछ कर गया था मैं
तुम्हारी चाह में रस्मे-जहाँ से लड़ गया था मैं
तुम्हारा ही हुआ होता जो तुम इजहार कर पातीं
तुम खामोश थीं बिलकुल अकेला पड़ गया था मैं
तुम जैसी कोई प्रतिमा ह्रदय में गढ़ नहीं पाए
तुम्हारी याद से आगे कभी हम बढ़ नहीं पाए
मोहब्बत के नर्म एहसास थे दोनों के सीने में
जुबां कुछ कह नहीं पायी नज़र हम पढ़ नहीं पाए
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