Tuesday, August 1, 2017

फीर  से कोई जेहन पे छाने लगा है 
बेधडक ख्वाबो में आने लगा है 
गीत गाता हूँ अकेले पर लगता है 
कोई साथ में  गुनगुनाने लगा है 
कर दो तुम मेरा तिरस्कार!
सर्वस्व समर्पन के ,स्वाभाविक प्रतिबंधों में तुमसे हार गया,
मैं पतित हुआ ,दम्भ -आवेश में तुम सी संगी को बिसार गया,
निष्कपट प्रेम पाकर भी तुमसे,भटका है मन अनगिनत बार।

कर दो तुम मेरा तिरस्कार.....