Thursday, September 22, 2011

''फूलों की खुशबू हो या चिड़ियों का कलरव भी
मानव -जनित या नैसर्गिक उत्सव भी
जिस आकर्सन का मै कर पता प्रतिकार नहीं
मन को बहलाता हूँ कहकर ,ये सानिध्य मुझे स्वीकार नहीं ''

Saturday, August 6, 2011

कितने लम्हे सावन बनकर आये यूँ ही चले गए
प्यार के लितने बदल घुमड़े बिन बरसे ही चले गए
टूट रहा है संयम मन का ये कैसा आकर्षण है
प्रेम कि बदरी बरस जाओ तपते मन का आमंत्रण है
तिल भर यदि प्रेम है मुझसे हर हर्ष -व्यथा में संग रहना
दुनिया देखेगी बस मुस्कान मेरी ,तुम आँखों में दर्द भी पढ़ना
नन्ही चिड़िया
जो ड्योड़ी पर अक्सर दिख जाती थी
कभी बेपरवाह स्वयं में खोयी
कभी सहम सी जाती थी
उसके नाज़ुक पंख ,बड़े स्वप्नों का बोझ नहीं उठा पते
कभी फुदक-फुदक कर चलती थी ,या
उड़ते-उड़ते गिर जाती थी
चीं-चीं चूं-चूं करके जाने क्या गाती थी
जाने क्यूँ मन लुभाने लगा था
उसका हर क्रियान्वयन
उसकी आदत सी हो गयी थी
पर दिन-प्रतिदिन कोमल पंख मजबूत हो रहे थे
और एक दिन ....

घर कि मुंडेर पर अंतिम बार देखा था उसे
अब उसका अल्हड़ बचपन
फुदकना सहमना
उड़ने कि कोशिश में गिरना
सब सिमटा है स्मृतियों में

नन्ही चिड़िया
आशीष तुम्हे
उन्मुक्त आकाश ,स्वच्छंद विचरण का
और विनती कि फिर आना
ड्योड़ी पर या घर कि मुंडेर पर ...